dahej mukt mithila

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बुधवार, 21 जून 2017

कनियाँ परिछन गीत

|| कनियाँ  परिछन  गीत || 


धीरे -  धीरे       चलियो   कनियाँ 
हम  सब   परिछन  अयलों    ना  | 
आबो      बिसरू    अपन  अंगना 
 हमरा    अंगना    अयलों    ना   || 
                    धीरे - धीरे  ------
लाउ  हे कलश जल , चरण पखारू 
अंगना     कनियाँ    अयली   ना   | 
शुभ - शुभ    गाबू   मंगल     चारु 
अंगना     कनियाँ    अयली   ना  || 
                        धीरे - धीरे  ------
  माय के बिसरू  कनियाँ ,बाबू के बिसरू 
हे   सुमिरु   सासू    जी   के   ना   | 
बिसरू        आबो     अपन     नैहर 
अहाँ     सासुर     अयलो     ना     || 
                           धीरे - धीरे  ------
महल अटारी कनियाँ  ,बिसरू भवनमा 
से      चीन्ही     लीय        ना  | 
" रमण "       टुटली         मरैया  
अहाँ      चीन्ही      लीय        ना  || 
                    धीरे - धीरे  ------

लेखक - 
रेवती रमण झा "रमण "

दहेज़ मुक्त मिथिला 60 किलोमीटर के दौड़ में धावक केर संग देलैथ हुनक संगिनी

मंगलवार, 6 जून 2017

लालदाइक चिठ्ठी

||  लालदाइक  चिठ्ठी || 
 रचैता - रेवती रमण झा " रमण "
 लाल दाई हम ई  चिठ्ठी 
लिखि  रहल  छी आमक  गाछी सँ  || 
कलकतिया  केरवी  कृष्ण भोग 
बम्बइ  बिज्जू करपुरिया  पर 
पातक छाया  सँ  फुदकि -फुद्कि 
कोकिल  अछि  अपन अलाप दैत 
कचकि  उठल  मोर ह्रदय अहाँ  बिनू 
ओकर करुण - पिपासी  सँ  || 
               लाल दाई --  लिखि रहल --
पपीहा गबैत , के अछि बुझैत 
ओ  कोन  दर्द मे  अछि  व्याकुल 
की पती  विरह में  पात -पात 
अति विरहाकुल 
दू टूक  करेजी  हमर भेल 
देखि ओकर प्रवल  अभिलाषी सँ || 
                 लाल दाई --  लिखि रहल --
तोता आ मैनाक बिवाद 
अछि चलि  रहल , तोता कहल 
सुन  रे  मैना ,  ई सत्य थीक 
हो नारी  या  पुरुष  जाति 
प्रीत  जोड़ी  , जे लैत  तोरि  
ओ  मानव छली  तँ  नर्क पौत 
मरियो कउ  जायत   जँ  काशी सँ  || 
            लाल दाई --  लिखि रहल --
बुल - बुल  प्रेमक जे हर्ष - विषाद 
की थीक  स्वाद  ?
वर गीत , प्रीत के गाबि  रहल 
सुख पाबि रहल  
 अछि  तरुण  तरुणियाँ  पत - दल  में 
सप्तम स्वर पंचम कल - रव सँ  || 
              लाल दाई --  लिखि रहल --
निम् कदम्ब इमली छाया तर 
बैसल पथ कउ  नित पाँतर  में
अहाँक  कुसल हम हेरि -  हेरि 
सदिखन  पूछैइत 
नित  अहींक  ग्राम - निवासी  सँ || 
            लाल दाई --  लिखि रहल --
                         -:-


बुधवार, 31 मई 2017

बजरंग - बत्तसी मैथिली हनुमान चालीसा से

बजरंग - बत्तसी 

             मैथिली हनुमान चालीसा से -
 ॥ छंद  ॥ 
जय  कपि काल  कष्ट  गरुड़हि   ब्याल- जाल 
केसरीक   नन्दन   दुःख भंजन  त्रिकाल के  । 
पवन   पूत  दूत    राम , सूत  शम्भू  हनुमान  
बज्र  देह  दुष्ट   दलन ,खल  वन  कृषानु के  ॥ 
कृपा   सिन्धु   गुणागार , कपि  एही  करू  पार 
दीन  हीन  हम  मलीन,सुधि  लीय  आविकय । 
"रमण "दास चरण आश ,एकहि चित बिश्वास 
अक्षय  के काल थाकि  गेलौ  दुःख गाबि कय ॥ 
|| दोहा || 
वंदऊ  शत  सुत  केशरी  सुनू   अंजनी  के  लाल  | 
विद्द्या बुधि आरोग्य बल दय  कय  करू निहाल  || 
||  चौपाई || 
जाहि  पंथ  सिय  कपि तंह  जाऊ  | रघुवर   भक्त    नाथे  हर्षाऊ  ॥ 
यतनहि धरु रघुवंशक  लाज । नञि एही सनक कोनो भल काज ॥ 
श्री   रघुनाथहि   जानकी  जान ।  मूर्छित  लखन  आई हनुमान  ॥ 
बज्र  देह   दानव  दुख   भंजन  ।  महा   काल   केसरिक    नंदन  ॥ 
जनम  सुकारथ  अंजनी  लाल । राम  दूत  कय   देलहुँ   कमाल  ॥ 
रंजित  गात  सिंदूर    सुहावन  ।  कुंचित केस कुन्डल मन भावन ॥ 
गगन  विहारी  मारुति  नंदन  । शत -शत कोटि हमर अभिनंदन ॥ 
बाली   दसानन दुहुँ  चलि गेल । जकर   अहाँ  विजयी  वैह   भेल  ॥ 
लीला अहाँ के अछि अपरम्पार ।  अंजनी    लाल    करु  उद्धार   ॥ 
जय लंका विध्वंश  काल मणि  । छमु अपराध सकल दुर्गुन गनि॥
  यमुन   चपल  चित  चारु तरंगे  । जय हनुमंत  सुमति   सुख गंगे ॥  
हे हनुमंत  सकल गुण  सागर  ।  युगहि चारि कपि  कैल उजागर ॥ 
अंजनि   पुत्र  पताल  पुर  गेलौं  । राम   लखन  के  प्राण   बचेलों  ॥ 
पवन   पुत्र  अहाँ   जा  के  लंका । अपन  नाम  के  पिटलों  डंका   ॥ 
यौ  महाबली  बल  कउ  जानल ।अक्षय कुमारक प्राण निकालल ॥ 
हे  रामेष्ट   काज  वर  कयलों  । राम   लखन  सिय  उर  में लेलौ  ॥ 
फाल्गुन  सखा  ज्ञान गुण सार ।  रुद्र    एकादश    कउ  अवतार  ॥ 
हे  पिंगाक्ष  सुमति  सुख  मोदक । तंत्र - मन्त्र  विज्ञान  के  शोधक ॥ 
अमित विक्रम छवि सुरसा जानि । बिकट  लंकिनी  लेल पहचानि ॥ 
उदधि क्रमण गुण शील निधान।अहाँ सनक नञि कियो वुद्धिमान ॥ 
सीता  शोक   विनाशक  गेलहुँ । चिन्ह  मुद्रिका  दुहुँ   दिश  देलहुँ ॥ 
लक्षमण  प्राण   पलटि  देनहार  ।  कपि  संजीवनी  लउलों  पहार ॥ 
दश   ग्रीव दपर्हा  ए कपिराज  ।   रामक  आतुरे   कउलों   काज  ॥ 
कपि   एकानन  ह्यो  पंचानन   |  जय हनुमंत   जयति  सप्तानान || 
यौ महाबली जग  दुख   मोचन  | दीव्य  दरश लय व्याकुल लोचन || 
वर गुण निधान विद्या-बुधि खान |अहाँ सनक नञि कियो हनुमान|| 
बिनु हनुमंत जुगुति  नञि  राम |  बिनु हरि  कृपा  कतय सुखधाम  || 
जतय अहाँ  मंगल तेहि  दुवारि | करुण कथा  कते  कहल पुकारी  || 
  यश  जत  गाऊ   वदन संसार  |  कीर्ति  योग्य नञि पवन कुमार  ||  
केशरी कंत  विपति  वर  भार  |  वेगहि  आबि  रमण   करू  पार  ||
प्रभु मन  बसिया  यौ  बजरंगी | कुमतिक  काल  सुमति के संगी  || 
सुनू कपि कखन हरब दुख मोर | बाटे   जोहि   भेलहुँ  हम   थोर  ||  
॥ दोहा ॥  
प्रात काल  उठि जे  जपथि ,सदय धरथि  चित ध्यान । 
शंकट   क्लेश  विघ्न  सकल  , दूर  करथि   हनुमान  ॥ 

रचैता -
रेवती रमण झा " रमण "
ग्राम - पोस्ट - जोगियारा पतोर
आनन्दपुर , दरभंगा  ,मिथिला
मो 09997313751